Monday, 19 February 2024

एकाकीपन

 वो शहर के नुक्कड़ का बड़ा मकान

और उसका छोटा सा कमरा,

स्मृतियों के पार कहीं भूला कहीं बिसरा।

असफलताओं से निराश,

मुझे देख उदास,

मुझसे लिपट गया और बोला,

चल मेरी सूनी पड़ी दीवारों को फिर सजाते हैं,

और कुछ नए स्लोगन आदि यहाँ चिपकाते हैं।

भूल गया कैसे अपने हर इम्तिहान से पहले

तू अपना हौसला बढ़ाता था,

और नए टाइम टेबल,प्रेरक पंक्तियों

और छाया चित्रों से मुझको सजाता था।

मै घंटो कौतूहल वश तेरे संग इस आनंद में खोया रहता,

और वह मोहक दृश्य अपनी आँखों में कैद कर लेता

जब अध्ययनरत थक कर तू सोया रहता।

वो वक़्त बेवक्त तेरे मित्रों का आना, हंसना हँसाना,

वाद विवाद और फिर विचारों की गहराइयों में डूब जाना

नित्य नई उमंग नया उत्साह जगाता

और वह जिसे गम कहते हैं कहीं दूर तक नज़र नही आता।

कुछ याद है जब उस पवित्र प्रेम की आहट ने तेरा मन छुआ था,

तो उसका एहसास तुझसे पहले मुझे हुआ था,

और वह तस्वीर जो तूने, 

मेरी दीवार पर लगाकर कभी फाड़ दी थी

तू रोया था और ये दीवारें भी तेरा साथ दी थी।

तेरे स्वभाव,समझ और ख़याल से वाकिफ़ था मै,

जिससे तू अनभिज्ञ उसमे भी शामिल था मै।

मेरा जो यह एक कमरे का स्वरूप है

कुछ और नही है तेरे खालीपन का अभिरूप है।

आज जीवन की आपा धापी में 

न जाने किस किस का बोझ उठाये

तू स्वंय से परे जा रहा है,

और अनायास ही नित्य नए संघर्ष को आमंत्रण दिए जा रहा है।

स्वंय से यह विरह तेरी असफलताओं का कारण है

गौर से देख तू स्वंय प्रत्यक्ष इसका उदाहरण है।

तो फिर क्यों न मै और तुम साथ बैठ,

पहले की तरह सफलताओं असफलताओं का विश्लेषण करते हैं।

और सब कुछ दरकिनार रख तुझसे मिलते हैं।

तू वह जिसे तू जानता है

या मै जानता हूँ

और मै वही तेरे खालीपन का अभिरूप,

स्मृतियों के पार कहीं भूला कहीं बिसरा

शहर के नुक्कड़ का बड़ा मकान और उसका छोटा सा कमरा।


……..देवेन्द्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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