Friday, 1 May 2020

राजनीति

किसे फर्क पड़ता है
कौन झूठा कौन सच्चा है,
जिसमें स्वार्थ सिद्ध हो जाए
वही तो अच्छा है।
स्वार्थ ही वर्तमान
राजनीति का मानक है,
भ्रम है कि ये बदलाव
अचानक है।
ये तो अनुक्रम है
सामाजिक और नैतिक विकारों का,
बदलती शिक्षा
और बदलते संस्कारों का।
क्या होना चाहिए
इस पर सभी एक मत है,
किन्तु कर्म में भिन्न-भिन्न
स्वार्थ संलिप्त है।
कर्तव्यपरायणता का मिथक
सामाजिक और नैतिक
सत्य से पृथक,
स्वार्थ ही राजनीतिक
विकृति का कारण है
व्यक्तिगत स्तर पर
हर व्यक्ति इसका उदाहरण है।
तो क्यों न कुछ बदलने की
उम्मीद से पहले
खुद को बदला जाए,
सर्वप्रतिष्ठित सत्य के
उसी एक मार्ग पर चला जाए
जिसपर सभी एक मत हैं,
उन्नति और उल्लास को सहमत है
व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय
प्रगति की सुरम्य प्रतीति है,
सही मायनों में
यही तो “राजनीति” है।

हिन्दोस्तां को अंगारों पर मैंने रोज सुलगते देखा

अपनी आंखों के ख्वाबों को घुट घुट कर यूँ मरते देखा,
हिन्दोस्तां को अंगारों पर मैने रोज सुलगते देखा।
अश्रुमयी क्षत विक्षत विखंडित भारत माँ का दामन है,
बच्चों की किलकारी वाले हर आंगन में मातम है।
चैन ओ अमन के रखवालो को बेबस और तड़पते देखा।
हिन्दोस्तां को अंगारों पर मैंने रोज सुलगते देखा।
दौर गुलामी का आया पर हृदय द्वीप आजाद रहा,
अंतिम श्वासों तक जिह्वा पर आजादी का स्वाद रहा।
भारत माँ की चरण वंदना कर वीरों को मरते देखा।
हिन्दोस्तां को अंगारों पर मैंने रोज सुलगते देखा।
धर्म अलग थे पंथ अलग थे अलग-अलग थी बोली भाषा,
किन्तु राष्ट्र की बलिवेदी पर एक रही सबकी परिभाषा।
जश्न-ए-आजादी के पीछे मातम नए उभरते देखा।
हिन्दोस्तां को अंगारों पर मैंने रोज सुलगते देखा।
आज न कोई बेड़ी बंधन न कोई पाबंदी है।
फिर भी जनमानस की आंखे निज स्वार्थ में अंधी है।
दुर्बल को सामर्थ्यवान के पैरों तले कुचलते देखा।
हिन्दोस्तां को अंगारों पर मैंने रोज सुलगते देखा।
देश भक्ति से भक्ति पृथक है,देश अकेला सा दिखता है,
देश भक्त कहलाने वाला नित्य नई साज़िश रचता है।
राजनीति के गलियारों में भक्ति का अर्थ बदलते देखा,
हिन्दोस्तां को अंगारों पर मैंने रोज सुलगते देखा।
सीमाओं पर जाने कितने घात लगाए बैठे हैं।
घर के भीतर उनसे ज्यादा आग लगाये बैठे हैं।
आस्तीन के सांपों को हर पल ज़हर उगलते देखा,
हिन्दोस्तां को अंगारों पर मैंने रोज सुलगते देखा।

आत्मा

अंश है परमात्मा का
ज्यों सागर और बूंदे
माया की है इक नदी
मोह जीवनधारा है।
आत्मा का सच यही है
यही ज्ञान सारा है
घटाकाश है और नभ है
दोनों ही आकाश है
किन्तु घट की सीमा में
बंधा हुआ आकाश है।
सृष्टि के संदर्भ को
घट का अस्तित्व है
वस्तुतः दोनों
एक ही तत्व है।

प्रतीक्षा-2

तुम यूँ अचानक छोड़ गए
सब रिश्ते नाते तोड़ गए
अब गीत लिखूं किसकी खातिर
किसकी खातिर नग़मे गाऊँ
पर्वत सी पीड़ा आ पहुची
विपदा की क्रीड़ा आ पहुची
हुंकार भरूँ किस साहस से
किस साहस से लड़ने जाऊं।
गीतों में श्रृंगार तुम्ही से
जीत तुम्ही से हार तुम्ही से
पाषाण हृदय सा लगता है
था खुशियों का संचार तुम्ही से।
नीर अश्रु के बहते प्रतिपल
किसको अपनी व्यथा सुनाऊं
यादों की सरिता में गिरकर
लौह खंड सा डूबा जाऊं।
लौट आओ तुम किसी हाल में
विरह वेदना सही न जाती,
मायूस हृदय,जर्जर काया में
चेतनता धुंधलाती जाती।
चौखट पर बैठे बैठे
जीवन बीता जाता है
किन्तु तुम्हारे आने का न
कोई संदेशा आता है।
चौखट और प्रतीक्षा को
अपनी अंतिम नियति बनाऊं
जो न आये तुम प्रियतम
मैं न खुद चौखट बन जाऊं।

जीवन मे कब आओगे

स्वप्न पटल पर तुम आते हो
रोम रोम मन हर्षाते हो।
भावों की निर्झर सरिता में
पुष्प कुमुद सा खिल जाते हो।
किन्तु हृदय में चिरानंद हो
गीत मधुर कब गाओगे।
जीवन मे कब आओगे।
पतझड़ बीता बसंत आया
धरा प्रफुल्लित नभ हर्षाया।
चहुंदिश नवउल्लास उमंगे
ऋतु ने गीत मिलन का गाया
मधुर मिलन की आस न हो
फिर ऐसे कब मिल पाओगे
जीवन मे कब आओगे।
दुख का वैभव आता है
अश्रु पीर का गाता है।
तन विरह की अग्नि में
निशदिन झुलसा जाता है
दुख की परिणति सुख हो
वह उपक्रम कब कर जाओगे
जीवन मे कब आओगे।
तप है कठिन प्रतीक्षा तेरी
अब न हो तनिक भी देरी।
जीवन के दिन गिनती के हैं
मुमकिन नही हैं हेरा फेरी।
एक एक दिन मधुमय हो जाये
वे दिन कब दिखलाओगे
जीवन मे कब आओगे।

कौन है जो मेरे भीतर है

कौन है जो मेरे भीतर है
जिसको मैं जान न पाऊँ,
मेरे नाम से जाना जाता
लेकिन मैं पहचान न पाऊँ।
 
दिन रात की आँख मिचौली
चाँद चाँदनी फिजा रंगीली,
कुंज लताएँ सुमन सुगंधित,
तरुवर की छाया अति ऊर्जित।
मेरी आँखों से देख रहा सब,
पर मैं उसको देख न पाऊँ।
 
बहती सरिता की धार प्रखर
झरनों के बहते मीठे स्वर,
कोयल कूके पंछी चहके
सातों सुर सरगम के गूंजे।
सुन रहा वह सब कुछ मुझमें
पर मैं उसको सुन ना पाऊँ।
 
सही गलत को गाता है
धूप छाँव दिखलाता है,
मन की मोटी परत जमी है
मन सब को भरमाता है।
है अछूता वह इन सब से,
मैं भी उसको छू न पाऊँ।
 
प्रतिपल है वह आभासों में
आता जाता है श्वासों में,
स्वयं सृष्टि सा लगता है
है कण-कण मे आकाशों में।
ज्ञान मुझे है उस चेतन का,
लेकिन उस तक पहुँच न पाऊँ।

तीज त्योहार

सती विरह में बैरागी हो
शिव समाधि में लीन हैं,
पार्वती है सती स्वरूपा
शिव तप में तल्लीन हैं।
 
क्यों न तुम पहचान रहे प्रभु
मैं ही शक्ति तुम्हारी हूँ,
स्मृतियों से विस्मृत हूँ
नियति लेख हारी हूँ।
 
जगत नियंता होकर भी
क्यों मुझको भूले हो स्वामी,
मेरी तप प्रतिष्ठा की क्या
बातें सब होंगी बेमानी।
 
तुमको पाने की जिद है
मैं सारे बंधन छोड़ूँगी,
जो न तुम अपनाओगे
मैं अपना व्रत न तोड़ूँगी।
 
पार्वती का तप कठोर है
शिव शम्भू को आना होगा,
दो प्रेमी युगलों की लय में
नियति को ढल जाना होगा।
 
मधुर मिलन की घड़ी आ रही
शिव की महिमा ऋतु गा रही,
चहक उठी हैं चारो दिशाएँ
दुख की काली घटा जा रही।
 
देवलोक से देव निहारे
व्रत अद्भुत सफल हुआ है,
नभ से सुमनों की वर्षा है
शिव के सम्मुख आई शिवा है।
 
रूप अलौकिक है अविकार
ज्यों प्रेयसी को पिया उपहार,
मधुर श्रावणी शुक्ल पक्ष में
प्रसिद्ध हुआ तीज त्योहार।