Sunday, 26 June 2016

एहसास


क्या मालूम था मीलों तक
यूँ पसरा सन्नाटा होगा
मेरे दिल से तेरे दिल तक
कुछ तो आता जाता होगा

मुड़कर मेरी ओर न देखा
उसने दूर जाने के बाद
मुमकिन हैं वहां कोई
उसका साथ निभाता होगा

घुटनों के बल झुक कर जब
कुछ बच्चों से बातें की
तब जाना कि तेरे दर पे
क्यों वह सर झुकाता होगा

माना कि उस ताकतवर की
जिद के आगे सब बेबस हैं
पर कोई तो डर होगा
जो उसको धमकाता होगा

आओ मिलकर रहने की
फिर एक कोशिश कर लेते हैं
मेरी तरह तेरा दिल भी
तुमको यह समझाता होगा।

..देवेन्द्र प्रताप वर्मा”विनीत”




हिन्दी साहित्य काव्य संकलन

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