Friday, 1 May 2020

कौन है जो मेरे भीतर है

कौन है जो मेरे भीतर है
जिसको मैं जान न पाऊँ,
मेरे नाम से जाना जाता
लेकिन मैं पहचान न पाऊँ।
 
दिन रात की आँख मिचौली
चाँद चाँदनी फिजा रंगीली,
कुंज लताएँ सुमन सुगंधित,
तरुवर की छाया अति ऊर्जित।
मेरी आँखों से देख रहा सब,
पर मैं उसको देख न पाऊँ।
 
बहती सरिता की धार प्रखर
झरनों के बहते मीठे स्वर,
कोयल कूके पंछी चहके
सातों सुर सरगम के गूंजे।
सुन रहा वह सब कुछ मुझमें
पर मैं उसको सुन ना पाऊँ।
 
सही गलत को गाता है
धूप छाँव दिखलाता है,
मन की मोटी परत जमी है
मन सब को भरमाता है।
है अछूता वह इन सब से,
मैं भी उसको छू न पाऊँ।
 
प्रतिपल है वह आभासों में
आता जाता है श्वासों में,
स्वयं सृष्टि सा लगता है
है कण-कण मे आकाशों में।
ज्ञान मुझे है उस चेतन का,
लेकिन उस तक पहुँच न पाऊँ।

तीज त्योहार

सती विरह में बैरागी हो
शिव समाधि में लीन हैं,
पार्वती है सती स्वरूपा
शिव तप में तल्लीन हैं।
 
क्यों न तुम पहचान रहे प्रभु
मैं ही शक्ति तुम्हारी हूँ,
स्मृतियों से विस्मृत हूँ
नियति लेख हारी हूँ।
 
जगत नियंता होकर भी
क्यों मुझको भूले हो स्वामी,
मेरी तप प्रतिष्ठा की क्या
बातें सब होंगी बेमानी।
 
तुमको पाने की जिद है
मैं सारे बंधन छोड़ूँगी,
जो न तुम अपनाओगे
मैं अपना व्रत न तोड़ूँगी।
 
पार्वती का तप कठोर है
शिव शम्भू को आना होगा,
दो प्रेमी युगलों की लय में
नियति को ढल जाना होगा।
 
मधुर मिलन की घड़ी आ रही
शिव की महिमा ऋतु गा रही,
चहक उठी हैं चारो दिशाएँ
दुख की काली घटा जा रही।
 
देवलोक से देव निहारे
व्रत अद्भुत सफल हुआ है,
नभ से सुमनों की वर्षा है
शिव के सम्मुख आई शिवा है।
 
रूप अलौकिक है अविकार
ज्यों प्रेयसी को पिया उपहार,
मधुर श्रावणी शुक्ल पक्ष में
प्रसिद्ध हुआ तीज त्योहार।

सपने

कभी अतीत के काल क्रम से
कुछ कुछ चुनते रहते
कभी मनस की इच्छाओं के
धागों की चादर बुनते
कभी अनेको घटनाओं के
जंजाल में उलझे रहते
कभी सुहानी डगर दिखाकर
मंद पवन मधुमय से बहते।
प्रियतम प्रेयसी की आंखों के
नव अंकुर फूटी शाखों के
गिरते झरने उड़ती पाँखों के
मित्र हुए सपने लाखों के।
उम्मीदों के टूटे सपने
पल भर में सब छूटे अपने
टूटे सपनों ने राह दिखाई
उम्मीदें फिर से बंध आई।
फिर से सज गए कितने सपने
मधुर मधुर मनभावन सपने।
भीतर के भय को समझाता
रातों का है स्वप्न डराता।
मनोवृत्ति को समझ सको।
चित्त शुद्ध आचरण करो।
सपना मधुमय फिर से गाता
इच्छाओं को राह दिखाता।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

जिंदगी

लाख आये तबाही के मंजर यहां
विघ्न व्याधि उदासी के खंजर यहां।
टूटता ही नही सिलसिला जिन्दगी
है बड़ा जीने का हौसला जिंदगी।
मौत सिरहाने पे मुस्कुराती खड़ी
हाथ में जिंदगी तेरी है हथकड़ी।
मुश्किलों के कहर से समर ठान लूं
इतना आसां नही हार मैं मान लूं।
नित संघर्ष ही है कहानी मेरी
हूं मैं इंसा यही है निशानी मेरी।
नई सुबह नई रोशनी आएगी
ये विपत्ति भी एक रोज टल जाएगी।
साथ हूँ मैं तेरे हर कदम हर जनम
होगी ऐसे नही ये कहानी खतम।
अश्रु मोती बने हैं तुम्हारे लिए
भूल जाओ न जो हमने वादे किए।
तेरी गलियों में आता जाता रहूंगा
जिंदगी मैं तुझे गुनगुनाता रहूंगा।
देवेंद्र प्रताप वर्मा’विनीत”

Monday, 20 April 2020

अराजक

किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी
ठहरो इस हादसे की और भी खबरें आती होगी।

मरने और मारने वालों के अलावा भी कोई था
कुछ भी स्पष्ट नही,कहना भले साफगोई था।

इस आग का दीदार तो रोज होता है
फिर नया क्या है जो तू धीरज खोता है।

तुझे शौक है देखने का तो देख तमाशा
माथे पर शिकन क्यों है,क्यों है निराशा!

आगे अभी और भी खबरें आएगी
मानवता का ह्रास कर दिल दहलायेगीं।

इस अराजकता को टोक सकता है
तू जानता है,तू इसे रोक सकता है।

आत्म मुग्ध हो तुम्हे तो बस राज करना है।
हर सुदृढ़ व्यवस्था पर ऐतराज करना है।

फिर वर्तमान पर शोक का ये दिखावा क्यों
तुम्हारे भीतर क्रोध का इतना लावा क्यों!

सब्र करो यह तुम्हे भी अपनाएगी
मौत अपना किरदार जरूर निभाएगी।

                   -देवेंद्र प्रताप वर्मा'विनीत'

Saturday, 30 June 2018

फिर आऊंगा गीत लिए

मिलन के बाद एक दूसरे से बिछड़ रहे प्रेमी प्रेमिका का संवाद-

मत रोक मुझे अब जाने दे
ऐ मीत मेरे, मेरे साथी
फिर आऊंगा गीत लिए
मनमीत मिलन के बाराती ।।

दूर चला जाऊं कितना भी
हर पल तेरे पास रहूंगा
तू खुश तो मैं भी खुश प्रियतम
तू नम तो मैं उदास रहूंगा ।।

सूना होगा घर का आंगन
सूने होंगे गलियारे
मोती बनकर बरसेंगे
मेरे दो नैना कजरारे ।।

कजरारे नैनों में मेरी
यादों के कुछ पल रखना
जब भी हो तन्हा तुम उनसे
जाकर अपना ग़म कहना ।।

दिल की बातें दिल ही जाने
नैनों  को क्या समझाना
तुझ बिन रोता है दिल मेरा
आंखे तो है एक बहाना ।।

छोड़ बहाने आँखों के 
दिल से दिल मिल जाने दे
मै फिर वापस आऊँगा
अब अश्कों को थम जाने दे ।। 

देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"

Tuesday, 1 May 2018

मजदूर

मै हुक्म पर हुक्म दिए जा रहा था
वह श्रम पर श्रम किये जा रहा था
बिना थके बिना रुके
तन्मयता से तल्लीन
अदभुत प्रवीन
पसीने में डूबा
सामने रखे
जल से भरे
घड़े की ओर देखता है
फिर उंगलिया से
माथे को पोछता है
माथे से टूटती
पसीने की बूंदे
धरा पर गिरती,
बनाती,
सूक्ष्म जलाशय
क्षण भर को
फिर उतर जाती
धरा की सतह
से धरा के हृदय में
वह मुस्कुराता
कृतज्ञता से
धन्य धन्य
हे वसुंधरा
कुछ बूंद ही सही
अतिसूक्ष्म
ही सही
तेरी तृष्णा को
तृप्त करती हैं
मेरे श्रम की ये उपज
पर क्या मेरी तृष्णा का
ऐसा स्वाभाविक उपचार है
श्रम का भी
कुछ अधिकार है।
या फिर हर बार मुझे यूँ
ही खटना होगा।
श्रम के अधिकार के लिए
लड़ना होगा।
जिज्ञासा ने रूप धरा
प्रकट हुई वसुंधरा
बोली
ऐसे घबराता क्यों है
जो अमूल्य है उसका मूल्य
लगाता क्यों है
मुझे देख
मैं सम्पूर्ण जगत को
धारण करती हूँ
निज श्रम से रचती हूँ
गढ़ती हूँ
तुम्हारे सरीखे कितने ही
पर क्या मैंने कभी उसका
मूल्य चाहा
अधिकार मांगा
मेरी तृप्ति को स्वतः ही
तत्पर है नदिया,झरने,बादल,
सागर,सावन और
न जाने ऐसे कितने ही।
मुझसे अलग नही है तू
गौर से देख अनुभव कर
खुद में मेरी तान
मेरी तरह अमूल्य है
तेरा श्रम और
उस श्रम से उपजी मुस्कान।।

देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"