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Tuesday, 1 May 2018

मजदूर

मै हुक्म पर हुक्म दिए जा रहा था
वह श्रम पर श्रम किये जा रहा था
बिना थके बिना रुके
तन्मयता से तल्लीन
अदभुत प्रवीन
पसीने में डूबा
सामने रखे
जल से भरे
घड़े की ओर देखता है
फिर उंगलिया से
माथे को पोछता है
माथे से टूटती
पसीने की बूंदे
धरा पर गिरती,
बनाती,
सूक्ष्म जलाशय
क्षण भर को
फिर उतर जाती
धरा की सतह
से धरा के हृदय में
वह मुस्कुराता
कृतज्ञता से
धन्य धन्य
हे वसुंधरा
कुछ बूंद ही सही
अतिसूक्ष्म
ही सही
तेरी तृष्णा को
तृप्त करती हैं
मेरे श्रम की ये उपज
पर क्या मेरी तृष्णा का
ऐसा स्वाभाविक उपचार है
श्रम का भी
कुछ अधिकार है।
या फिर हर बार मुझे यूँ
ही खटना होगा।
श्रम के अधिकार के लिए
लड़ना होगा।
जिज्ञासा ने रूप धरा
प्रकट हुई वसुंधरा
बोली
ऐसे घबराता क्यों है
जो अमूल्य है उसका मूल्य
लगाता क्यों है
मुझे देख
मैं सम्पूर्ण जगत को
धारण करती हूँ
निज श्रम से रचती हूँ
गढ़ती हूँ
तुम्हारे सरीखे कितने ही
पर क्या मैंने कभी उसका
मूल्य चाहा
अधिकार मांगा
मेरी तृप्ति को स्वतः ही
तत्पर है नदिया,झरने,बादल,
सागर,सावन और
न जाने ऐसे कितने ही।
मुझसे अलग नही है तू
गौर से देख अनुभव कर
खुद में मेरी तान
मेरी तरह अमूल्य है
तेरा श्रम और
उस श्रम से उपजी मुस्कान।।

देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"

Tuesday, 17 April 2018

क्षणिक

जवाब सीधा है सरल है
पीछे कई कठिन सवाल है
क्षणिक जो भी है
एक लंबा संघर्ष है अंतराल है
मुस्कुराहटें
जो प्रतिमान हैं
दिव्यता की पहचान हैं
अंतस में समेटे हैं
पीड़ा के कई महासिंधु
यूँ ही नही है ज्योतिर्मयी
मधुमय मुख-बिंदु।
 
देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"