Wednesday, 11 April 2018

धूल

बारीक महीन सी
उमड़ती घुमड़ती
हवाओं के संग
मचलती गिरती
फूलों पत्तियों पर
जमती फिसलती
तुम लाख झाड़ती
पोंछती हटाती 
दबे पांव चुपके से
फिर आ जाती
बांध दो कस कर
रख दो बंद कर
छुपा कर
किवाड़ में
कोई निशानी
जब खोलेगे
एक चादर बनी
चिढ़ाती हुई
मुस्कुराती
ताने मारती ।
कितने दिवस बीत गए
तुम्हारी याद में आये
भूल जाते हो
अपनी सबसे प्यारी
अनमोल चीज को
हृदय से लगाये
फिरते थे जिसे
गाते मुस्कुराते
हक जताते,
अनगिनत
ख्वाब सजाए ।
कुछ पुरानी किताबों,
तस्वीरों,उपहारों
पर जमी "धूल"
जो तुम्हारे लिए
है बेकार "निर्जीव" सी
प्रश्न चिन्ह लगाती
तुम्हारे बोध
तुम्हारी संवेदना पर
कण कण
दिखती है
शास्वत सजीव सी।।

देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"

Saturday, 4 March 2017

जीवन

कहीं खुशी की धूप,
कहीं आंसुओं की रात है;
क्यों मिला जीवन तुम्हें
यह सोचने की बात है।
पुष्प के हृदय को छू,
अनिल ने कहा हे सुमन;
तुम चिर सुंगंध की निधि,
तुम प्रेम के प्रदीप हो।
तुम मंद मुस्कुराते,
मधुर साज़ के संगीत हो;
मै जीव मे जीवन प्रवाह की,
पवित्र अनुभूति हूँ।
तुम कुंज की कोमल कला की
कल्पना के गीत हो।
यह स्वर्ग सा सुंदर,
सघन उपवन हर्ष से हर्षित है
फिर वेदना का कौन सा मर्म,
हृदय पर अंकित है;
कह दो मुझसे निज मन का दुख,
कुछ बाँट सकूँ रख दो सम्मुख;
कितने ही घनघोर घने हो,
सुख की रवि आभा को धरे हों;;
पवन प्रबल की आकांक्षा से
वारिधि शीश झुकाते है।
और अखिलेश गगन के दीपक
रश्मि वृष्टि कर पाते हैं ।
प्रेरणा की लौ अलौकिक मे,
आलोकित हो उठा प्रसून;
बोला मुझको मार्ग दिखाओ,
मेरे मन का क्लेश मिटाओ;
मुझ तक ही क्यों सीमित है,
तृप्ति सुधा की मधुर सुगंध;
कैसे ले जाऊँ दूर भवन तक,
इस जीवन की स्नेह तरंग।
कई शोकाकुल हैं प्राणवायु मे,
नीरसता के दर्शन से;
कैसे भर दूँ उल्लास वहाँ,
अपने अंतः के कण कण से;
यही पीड़ा यही हृदय का मर्म,
जिसके तम मे व्याकुल तन-मन;
सदभावना की ऐसी छवि पर,
मोहित हुआ पवन का मन;
हाथ पकड़ ले साथ चल पड़ा
रत्न सुगंधित मनभावन।
सर्वत्र सकल आनंद बहे,
यही पुष्प की सौगात है।
क्यों मिला जीवन तुम्हें
यह सोचने की बात है।
छू रही आकाश,
पर्वत की सुनहरी चोटियाँ;
दे रही है श्वास,
धरा को प्रभा की रश्मियां;
हिम श्रृंखला का खंड एक,
अपनी लगन मे चूर है;
जैसे प्रकृति की छांव मे,
कहीं नाचता मयूर है।
वो हिमांशु दिव्यान्शु,
जीवन समर्पित कर रहा;
सरिता सदृश स्वरूप धर,
निज वेग मे बह रहा।
खग विहग तृण वृक्ष,
मानव की अतुल प्रकृति मे;
भर रहा नवप्राण जीवन की
प्रत्येक वृत्ति मे।
मेघ से अभिषेक कर,
चिर अनंत आकाश का;
रख किया हृदय मे,
तीक्ष्ण वैभव प्रकाश का;
है अर्चना परमार्थ की
परमार्थ से संज्ञात है।
क्यों मिला जीवन तुम्हें
यह सोचने की बात है ।
……..देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

Sunday, 23 October 2016

प्रतीक्षा

कोई नही था
उसका
जिसे वह
अपना कहती
सिवाय तुम्हारे
शायद तुम नही जानते
प्रभा की पहली किरन से
स्वप्नों की
अंतिम उड़ानों तक
प्रतिदिन प्रतिक्षण
सिर्फ तुम थे
शायद तुम नही जानते
सर्दी की धूप में
स्वेटर के धागों में
उलझते
संवेदनाओं में
आकार लेते
कभी
सरसों के खेत की
पगडण्डी पर
उसकी गोद में
सिर टिकाये
उसे निहारते
उसकी अंतरंग सी
बातों में हँसते
खिलखिलाते
उसकी बाँहों में
लिपटे
दुःख की परछाइयों पर
रौब गांठते
कभी सिरहाने
तकिये के नीचे से
निकल
मधुर मिलन की
आस में लरज़ते
अधरों के नाजुक स्पर्श
तक सिर्फ तुम थे
शायद तुम नही जानते
उसने कहा नही
कभी किसी से
सिवाय तुमसे
कि सिर्फ तुम थे
तुम जानते हो
सिर्फ तुमने महसूस किया
उस पवित्र प्रेम की गहराई को
और उड़ चले उसके संग
प्रेम के असीम अनंत
आकाश में
जहां मिट जाता है
दो होने का भाव
शायद
तुम जानते हो
फिर भी तुम खामोश रहे
और उसने भी कुछ
नही कहा कभी
किसी से
और चुपचाप
निभाई
तालीम और
संस्कार की
वह परंपरा
जिसके परिणीत
मै आया
तुम जानते हो
अब मै हूँ
जिसे वह
अपना कहती है
तुम जानते हो
पर मै नही जान पाया
क्यों हूँ
जबकि तुम हो
शायद तुम नही जानते
नही ले सकता
मै तुम्हारी जगह
और न भर सकता
हूँ उस खालीपन को
जो उत्पन्न हुआ है
मेरे होने से
बस मुझे “प्रतीक्षा”
है प्रेम के उसी असीम अनंत
आकाश में उतर “तुम” होने की
शायद तुम नही जानते
यही मेरी नियति है
शायद तुम नही जानते।
……देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत’

Saturday, 15 October 2016

मनमौजी

मनमौजी

तदा यदा कदा लिए
कहाँ चले ध्वजा लिए
अरसा हुआ नया लिए
फटा मिला सिला लिए
हाव भाव ताव मे
अभाव के प्रभाव मे
पीर सिंधु पार कर
नगर नगर डगर डगर
प्रीत की शिखा लिए
द्वार खटखटा लिए|

Friday, 14 October 2016

बचपन के दिन

बचपन के दिन

स्मृतियों के मेघ बरसते भीग रहा है अन्तर्मन
दूर गाँव की पगडंडी पर चहक रहा मेरा बचपन
ढल रही दुपहरी गौशाला से कजरी गईया रही पुकार
बाबा संग छोटे चरवाहों की टोली देखो है तैयार
बंधन मुक्त किन्तु अनुशासित चले झूमते जीव सभी
ज्यों उल्लास की आभा मे हुए सभी सजीव अभी
द्वेष नहीं है क्लेश नही है कहीं किसी के होने से
जात पात और भेद भाव के दैत्य लगे हैं बौने से
खेल शुरू है आज तो काका लगता है कि हारेंगे
बच्चों ने हुंकार भरी है शायद बाजी मारेंगे
वो तालाब के ऊपर जो पतली आम की डाली है
मै उस पर उल्टा झूल रहा हर फिक्र से तबीयत खाली है
कच्चे आमों से लदा हुआ यह वृक्ष न जाने किसका है
जो पत्थर मार गिरा देगा सच पूछो तो उसका है ।
दूर किसी कुटिया से देखो बूढ़ी काकी चिल्लाती है
भागो सारे बच्चों वह डंडा लेकर आती है ।
अद्भुत है यह दृश्य मनोहर भूले नहीं बिसरता है
मन बचपन की स्मृतियों मे खिलता और महकता है

Saturday, 2 July 2016

रणभेरी

ईश्वर की बनाई हुई इस सृष्टि मे कोई भी रचना अधूरी नहीं है। आवश्यकता है तो सिर्फ पहंचानने की,स्वयं मे विश्वास जगाने की । आत्म विश्वास ही सृष्टि से साक्षात्कार का प्रेरक है,अतः स्वयं मे विश्वास होना नितांत आवश्यक है । स्वयं को जानने की यह यात्रा संघर्षों से परिपूर्ण है और आत्म विश्वास से ही इस यात्रा को सहज और बनाया जा सकता है । आत्म विश्वास के बिना लक्ष्य के प्रति एकाग्रता संभव नहीं है ।
विद्यालयों एवं शैक्षणिक संस्थानों मे विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन विद्यार्थियों मे आत्म विश्वास जागता है और उन्हे जीवन के अनेक कटु एवं सुखद अनुभवों मे सहज रहने की इच्छाशक्ति प्रदान करता है।

बज उठी समय की रण-भेरी
अब रण कौशल की बारी है,
हार मिले या जीत मिले
कर्तव्य प्रथा ही प्यारी है।
साहस किसमे है कितना
किसमे कितना विश्वास भरा,
इस महासमर मे उठती
प्रश्नो की पावन चिंगारी है।
प्रतिभाओं के सूर्य कई हैं
कई सितारों के साथी,
आगे बढ़ पाऊँगा कैसे
जुगनुओं का मै बाराती ,
अपने महिमा मंडन को
बहुत किया है व्यर्थ प्रलाप,
सार्थक करने सार्थकता को
करना होगा “वार्तालाप” ।
है “असमंजस” मे चित्त मेरा
चिंता मे चित न हो जाऊँ ,
“हल्ला बोलूँ” किस कौशल से

किस कौशल से सम्मुख आऊँ ।

है “प्रस्तुति” परमार्थ की
परमार्थ इसका पूर्ण है,
शील साहस धैर्य से
अब मन मेरा सम्पूर्ण है।
साथ लिए टिम टिम जुगनू की
मै आगे बढ़ता जाता हूँ,
लौ निचोड़ अपनी सारी
मै सूरज से टकराता हूँ।
बुद्धि विवेक का अवलोकन हो
या प्रश्नो का हो प्रहार,
अति-विनीत हो सबका मै
प्रत्युत्तर देता जाता हूँ।
तन्मयता की ऐसी छवि पर
सोच मे पड़ा विधाता है,
मैंने लक्ष्य को साधा है
या लक्ष्य ने मुझको साधा है।
हार हो या जीत हो
बस युद्ध करने का जुनून है,
जब तक रहूँ मर्यादित रहूँ
फिर बिखर जाऊँ शुकून है।
है “अपूर्व” “शोभित” “अनंत”
इस महासमर की कांति किरण,
चहुंदिश चंचल चातुर्य लिए
स्वच्छंद विचरता ख्याति हिरण।
उस “बागेश्वर” की बाग के
हम “पल्लव” हैं “प्रतीक” हैं,
“अभिषेक” कर प्रकाश से
जिसने दिया सादर शरण ॥
….देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”
स्मृतियां – यह कविता मेरे कालेज के एक वार्षिक techincal festival “Enigma-2008” से प्रेरित है जिसमे उस वर्ष विभिन प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया था जैसे-“वार्तालाप”,”असमंजस”,”प्रस्तुति”व”हल्ला बोल”।अपूर्व,शोभित,वागेश्वर,प्रतीक,अनंत व अभिषेक आदि इस वार्षिक प्रतियोगिता के आयोजक मण्डल के सदस्य थे। यह कविता मेरे सभी मित्रों एवं आयोजक मण्डल के सम्मानित सदस्यों को समर्पित है।

Friday, 1 July 2016

कवितायें भी रोती हैं

कवितायें भी रोती हैं

कुछ हँसती हैं कुछ गाती हैं
कुछ जीवन का रस दे जाती हैं
कुछ देश प्रेम की बातें कर
कर्तव्य की राह दिखाती हैं
कुछ प्रेम के गीत सँजोती हैं
कुछ दिल की मीत होती हैं
करें नवयुग का जो सूत्रपात
कुछ ऐसी कविता होती हैं।
किन्तु! कर अंधकार को धूल धूसरित
जो ज्योति नयन मे सोती है
ढलते सूरज का दर्द लिए
वो कवितायें भी रोती हैं ।
ममता के अंचल से वंचित
कोई बालक भूखा रोता है
दूर शहर की बस्ती मे
किसी गलियारे मे सोता है,
नन्हें नाजुक कंधे जब
परिवार का बोझ उठाते हैं,
कलाम किताब न गुरुकुल कोई
श्रम ही श्रम अपनाते हैं,
जब सोनपरी के स्वप्नरात्रि
की भी आँखें नम होती हैं,
ढलते सूरज का दर्द लिए
तब कवितायें भी रोती हैं।
…….देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”