Wednesday, 18 May 2016

ख़त्म मेरा किरदार करो

अब दुनिया के रंगमंच से
ख़त्म मेरा किरदार करो
अपनी मर्जी से रो पाऊँ
इतना तो उपकार करो
हर टुकड़े को जोड़ रहा हूँ
पर खुद को ही छोड़ रहा हूँ
इस टुकड़े के जुड़ने का भी
प्रबंध किसी प्रकार करो।
सपनों नें नींदे छीनी
और अपनों ने सपने छीने
बरसों की जागी आँखों अब
चिर निद्रा स्वीकार करो।


…देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”