Tuesday, 15 January 2019

बस इतनी सी बात हुई है

*बस इतनी सी बात हुई है*

बस इतनी सी बात हुई है
बातें सारी रात हुई है
सुलझे थे जो उलझे हैं अब
कैसी ये मुलाकात हुई है।

प्रेम मुखर होता है जब भी
खामोशी चिल्लाती है
तन्हा रहने वाले को भी
तन्हाई न भाती है
डूब ख़यालो में तेरे वो
खुद से बातें करता है
तेरा एक ठिकाना
उसके दिल में
तू अब रहता है
तन महके सोंधी मिट्टी सा
ज्यों पहली बरसात हुई है।

नर्म बिछौने हो रेशम के
नींद नही फिर आने वाली
प्रियतम से दूरी की रातें
होगी बड़ी सताने वाली
हृदय सिंधु का सृजन प्रेम की
व्यापकता का सार रहा
प्रेम अश्रु की प्रथम बूंद ने
पलकों से पुचकार कहा
इक दौर चलेगा अश्कों का
अभी तो बस शुरुआत हुई है।

कल तक जो बेगाना था
वो भी अपना सा लगता है
नफरत का संसार बृहद था
अब अदना सा लगता है।
लड़ कर जीत न पाया उनको
सिर अपना कई बार धुना
पत्थर पिघल गए राहों के
जब फूलों का हार चुना।
धूप छांव के मधुर मिलन की
नित्य नई प्रात हुई है।

बस इतनी सी बात हुई है
बातें सारी रात हुई है।

       -देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"

Friday, 24 August 2018

कुछ रिश्ते

*कुछ रिश्ते*

वर्षों गुजर जाते हैं
कुछ रिश्ते बनाने में
मौसम बदल जाते हैं
उनके करीब आने में
किस्मत से ये रिश्ते
बन भी जाएं तो यारों
आशियाने उजड़ जाते हैं
इनको निभाने में
विश्वास के कच्चे धागों से
इनकी तकदीरें बनती हैं
सच्चे प्रेम के अमृत से
मन की तस्वीर संवरती है
ग़म छीन कर उनसे उन्हें
खुशियों की सौगात दें
तब कहीं सपनों की कलियां
हकीकत के रंग में ढलती हैं
मुश्किलें बढ़ जाती हैं
प्यार की लौ जलाने में
बर्षों गुजर जाते हैं
कुछ रिश्ते बनाने में
इस तरफ से प्यार बरसे
उस तरफ से भी करार
दोनों की धडकनों को हो
एक दूजे पे ऐतबार
रिश्तों के बाग को
वफ़ा के आंसुओं से
सींच दो
फिर जिंदगी की राह पे
मुस्कुराएगी बहार
सदियां गुजर जाती है
ऐसे रिश्ते भुलाने में
वर्षों गुजर जाते हैं
कुछ रिश्ते बनाने में।

--देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"

Saturday, 30 June 2018

फिर आऊंगा गीत लिए

मिलन के बाद एक दूसरे से बिछड़ रहे प्रेमी प्रेमिका का संवाद-

मत रोक मुझे अब जाने दे
ऐ मीत मेरे, मेरे साथी
फिर आऊंगा गीत लिए
मनमीत मिलन के बाराती ।।

दूर चला जाऊं कितना भी
हर पल तेरे पास रहूंगा
तू खुश तो मैं भी खुश प्रियतम
तू नम तो मैं उदास रहूंगा ।।

सूना होगा घर का आंगन
सूने होंगे गलियारे
मोती बनकर बरसेंगे
मेरे दो नैना कजरारे ।।

कजरारे नैनों में मेरी
यादों के कुछ पल रखना
जब भी हो तन्हा तुम उनसे
जाकर अपना ग़म कहना ।।

दिल की बातें दिल ही जाने
नैनों  को क्या समझाना
तुझ बिन रोता है दिल मेरा
आंखे तो है एक बहाना ।।

छोड़ बहाने आँखों के 
दिल से दिल मिल जाने दे
मै फिर वापस आऊँगा
अब अश्कों को थम जाने दे ।। 

देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"

Sunday, 13 May 2018

चिता

अनल की लपट
धधकती झपट
देह कर भस्म
निभाती रस्म
हृदय उदगार
जीव की पुकार
पीर प्रतिकार
खत्म चीत्कार
कर्म का लेख
नियति उल्लेख
जिधर भी देख
भ्रम मति रेख ।
अनल की लपट
हुई है प्रकट
करो स्वीकार
सत्य साकार
आत्म संगीत
बोध का गीत
हृदय में झांक
पीर को ताक
मिला क्या है
गिला क्या है
अनल की लपट
दैव की रपट
ब्यर्थ की ब्याधि
अंत है आदि
तुम्हारा कथ्य
तुम्हारा सत्य
तुम्ही तुम हो
कहाँ गुम हो
निरख जग बसि
तत त्वम असि ।
देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

Tuesday, 1 May 2018

मजदूर

मै हुक्म पर हुक्म दिए जा रहा था
वह श्रम पर श्रम किये जा रहा था
बिना थके बिना रुके
तन्मयता से तल्लीन
अदभुत प्रवीन
पसीने में डूबा
सामने रखे
जल से भरे
घड़े की ओर देखता है
फिर उंगलिया से
माथे को पोछता है
माथे से टूटती
पसीने की बूंदे
धरा पर गिरती,
बनाती,
सूक्ष्म जलाशय
क्षण भर को
फिर उतर जाती
धरा की सतह
से धरा के हृदय में
वह मुस्कुराता
कृतज्ञता से
धन्य धन्य
हे वसुंधरा
कुछ बूंद ही सही
अतिसूक्ष्म
ही सही
तेरी तृष्णा को
तृप्त करती हैं
मेरे श्रम की ये उपज
पर क्या मेरी तृष्णा का
ऐसा स्वाभाविक उपचार है
श्रम का भी
कुछ अधिकार है।
या फिर हर बार मुझे यूँ
ही खटना होगा।
श्रम के अधिकार के लिए
लड़ना होगा।
जिज्ञासा ने रूप धरा
प्रकट हुई वसुंधरा
बोली
ऐसे घबराता क्यों है
जो अमूल्य है उसका मूल्य
लगाता क्यों है
मुझे देख
मैं सम्पूर्ण जगत को
धारण करती हूँ
निज श्रम से रचती हूँ
गढ़ती हूँ
तुम्हारे सरीखे कितने ही
पर क्या मैंने कभी उसका
मूल्य चाहा
अधिकार मांगा
मेरी तृप्ति को स्वतः ही
तत्पर है नदिया,झरने,बादल,
सागर,सावन और
न जाने ऐसे कितने ही।
मुझसे अलग नही है तू
गौर से देख अनुभव कर
खुद में मेरी तान
मेरी तरह अमूल्य है
तेरा श्रम और
उस श्रम से उपजी मुस्कान।।

देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"

Tuesday, 17 April 2018

क्षणिक

जवाब सीधा है सरल है
पीछे कई कठिन सवाल है
क्षणिक जो भी है
एक लंबा संघर्ष है अंतराल है
मुस्कुराहटें
जो प्रतिमान हैं
दिव्यता की पहचान हैं
अंतस में समेटे हैं
पीड़ा के कई महासिंधु
यूँ ही नही है ज्योतिर्मयी
मधुमय मुख-बिंदु।
 
देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"

Wednesday, 11 April 2018

धूल

बारीक महीन सी
उमड़ती घुमड़ती
हवाओं के संग
मचलती गिरती
फूलों पत्तियों पर
जमती फिसलती
तुम लाख झाड़ती
पोंछती हटाती 
दबे पांव चुपके से
फिर आ जाती
बांध दो कस कर
रख दो बंद कर
छुपा कर
किवाड़ में
कोई निशानी
जब खोलेगे
एक चादर बनी
चिढ़ाती हुई
मुस्कुराती
ताने मारती ।
कितने दिवस बीत गए
तुम्हारी याद में आये
भूल जाते हो
अपनी सबसे प्यारी
अनमोल चीज को
हृदय से लगाये
फिरते थे जिसे
गाते मुस्कुराते
हक जताते,
अनगिनत
ख्वाब सजाए ।
कुछ पुरानी किताबों,
तस्वीरों,उपहारों
पर जमी "धूल"
जो तुम्हारे लिए
है बेकार "निर्जीव" सी
प्रश्न चिन्ह लगाती
तुम्हारे बोध
तुम्हारी संवेदना पर
कण कण
दिखती है
शास्वत सजीव सी।।

देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"